बीजेपी-शिवसेना गठबंधन टूटने के बाद इस पद के लिए होने जा रहा है चुनाव, जानें किसका पलड़ा है भारी

बीजेपी-शिवसेना गठबंधन टूटने के बाद इस पद के लिए होने जा रहा है चुनाव, 


महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर चल रही लड़ाई के बीच शिवसेना ने पिछले दिनों बीजेपी से 30 साल पुराना रिश्ता तोड़ने का एलान किया. अब शिवसेना महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी के साथ सरकार बनाने की जुगत में है.



मुंबई: महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन में टूट का असर 22 नवंबर को मुंबई मेयर के लिए होने वाले चुनाव पर भी पड़ सकता है. बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) के 2017 में हुए चुनावों में 227 सदस्यीय नगर निगम में शिवसेना के 84 पार्षद जीते थे, वहीं सहयोगी बीजेपी के 82 पार्षदों ने जीत हासिल की थी.

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तब बीजेपी ने शिवसेना को समर्थन दिया था और विश्वनाथ महादेश्वर को मेयर चुना गया. महादेश्वर का ढाई साल का कार्यकाल इस साल सितंबर में समाप्त हो गया लेकिन 21 अक्टूबर को हुए विधानसभा चुनावों को देखते हुए उनका कार्यकाल नवंबर तक बढ़ा दिया गया.

विधानसभा चुनाव के 24 अक्टूबर को आए परिणामों के बाद दोनों दलों के बीच दरार आ गई जहां शिवसेना मुख्यमंत्री पद को लेकर समान साझेदारी की मांग पर अड़ी हुई थी. शिवसेना के इस समय 94 पार्षद हैं जिनमें छह पार्षद महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना से आए थे. बीजेपी के 83, कांग्रेस के 28, एनसीपी के आठ, समाजवादी पार्टी के छह, एमआईएम के दो और मनसे का एक पार्षद है.

मेयर पद के चुनाव के लिए बीजेपी के उम्मीदवार उतारने की संभावनाओं के सवाल पर पार्टी की मुंबई इकाई के अध्यक्ष मंगल प्रभात लोढा ने कहा कि उसने अभी तक इस पर निर्णय नहीं किया है. सपा के रईस शेख ने कहा कि उनकी पार्टी कांग्रेस के साथ बातचीत कर रही है और जल्द फैसला लिया जाएगा.

आरटीआई अर्जियों के माध्यम से देश के सबसे धनवान नगर निगम में अनेक घोटाले उजागर करने वाले कार्यकर्ता अनिल गलगली ने कहा कि इस समय बीजेपी का रुख अहम होगा जहां राज्यस्तर पर कांग्रेस-एनसीपी की शिवसेना के साथ बातचीत चल रही है.

उन्होंने कहा, ‘‘सबसे संभावित परिदृश्य में कांग्रेस और राकांपा विभिन्न समितियों में पद मांग सकते हैं, वहीं अगर बीजेपी उम्मीदवार खड़ा करने का मन बनाती है तो उसे नेता प्रतिपक्ष का पद मिल सकता है.’’


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आ गई औकात में शिवसेना, पवार की पलटी से गच्चा खाया

 पवार की पलटी से गच्चा खाया


महाराष्ट्र का सियासी समीकरण कुछ इस कदर उलझ गया है कि अगले पल क्या होने वाला है, इसका अंदाजा तक लगा पाना भी बेहद मुश्किल  हो चुका है. कभी शिवसेना अपने सहयोगी दल का साथ छोड़कर, गठबंधन तोड़कर उन विरोधियों के साथ हाथ मिला लेती है, जिसे कभी सामने से फूटी आंख देखना भी पसंद नहीं करती थी.




तो कभी उसकी हाल ही में बने दो दोस्त (कांग्रेस और शिवसेना) की तरफ से ऐसा बययान सामने आता है, जिसे देखकर ये शंका होने लगती है कि कहीं उसके पुराने दुश्मन ठाकरे परिवार के साथ कहीं खेल तो नहीं खेल रहे हैं.

अब तेरा क्या होगा 'कालिया'?
शिवसेना की जो हालत हो गई है, उसे देखकर शोले फिल्म का एक बेहतरीन सा डायलॉग याद आ रहा है. गब्बर सिंह अपने एक पुराने साथी को दिए काम में नाकामयाब होने के बाद एक सवाल पूछता है, 'तेरा क्या होगा कालिया?' पूरे सीन का बखान कर पाना तो फिलहाल मुश्किल है, लेकिन शिवसेना के पास अब कोई चारा नहीं बचा है. उसके एक तरफ कुआं है तो दूसरी तरफ खाई, अब तो शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे अपने बड़बोले नेता संजय राउत से ये जरूर पूछ रहे होंगे कि 'मैं किधर जाऊं भाई?' जाहिर है, पुत्र मोह के मायाजाल में फंसकर शिवसेना प्रमुख ने अपने साथ-साथ पार्टी की हालत भी ऐसी कर दी है कि लोग उनके सवाल पूछ-पूछकर उनकी खटिया खड़ी कर रहे हैं. लेकिन शिवसेना के इस हाल की जिम्मेदार वो खुद ही हैं. उसकी जिद और संजय राउत का बड़बोलापन शिवसेना-भाजपा के रिश्ते में सबसे ज्यादा खटास पैदा करने का काम किया है.

बैकफुट पर आए 'जनाब'
यहां जनाब से तात्पर्य शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत के परिचय का है, क्योंकि ये वही जनाब है जिन्होंने महाराष्ट्र में नतीजे सामने आने के तुरंत बाद ऐसे तेवर अपना लिए थे, जैसे इन्हें भाजपा-शिवसेना के रिश्ते  में दरार पैदा करने के लिए ही ठेका मिला हो. इतना तो इतना, लेकिन हद तो तब हो जाती, जब ये जनाब शिवसेना के जिस मुखपत्र के संपादक हैं, उस 'सामना' में भी भाजपा को खूब कोसा जाता है. लेकिन इस बीच नतीजे आने के बाद से भाजपा से रिश्ते बिगड़ने के बाद तक बड़े-बड़े डींगे हांकने वाले संजय राउत इन दिनों महाराष्ट्र में सरकार बनाने को लेकर बैकफुट पर आते दिखाई दे रहे हैं. उन्होंने अपने नए दोस्त से नाराजगी का इशारा करते हुए ये बोला कि सरकार बनाने की जिम्मेदारी शिवसेना की नहीं है जनाब यहीं चुप नहीं हुए, उन्होंने इसके साथ ये भी कहा कि ये जिम्मेदारी जिसकी है वो भाग निकले हैं. संजय राउत का ये बदला तेवर उस वक्त नजर आया जब एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ मुलाकात की. मुलाकात के बाद मानिए पवार के अब ये बयान के दो मायने निकाले जा रहे हैं.

बदले तेवर का पहला मायने
या तो शिवसेना ने इस बात को स्वीकार लिया है कि उनके साथ कांग्रेस-एनसीपी ने जबरदस्त खेल करते हुए उसे गच्चा दे दिया है. क्योंकि सोनिया गांधी से मुलाकात के बाद एनसीपी प्रमुख ने जब एक बड़ा बयान दिया उसके तुरंत बाद ही राउत ने मीडिया के सामने आकर ये बयान दिया. यानी वो भाजपा के कंधे पर बंदूक रखकर अपने नए दोस्त पर तंज कसने का प्रयास कर रहे थे.

राउत के रुख का दूसरा मायने
राउत के इस बयान से ये तो समझना बिल्कुल साफ है कि वो गठबंधन में पड़े दरार पर अफसोस जताने की कोशिश कर रहे हैं. भाजपा से रिश्ते खराब होने का सारा ठिकरा उसी के मत्थे मढ़ रहे हैं. यानी वो एक बार फिर भाजपा को इस टूट का दोषी बता रहे हैं, लेकिन जनाब के तेवर में काफी तब्दीलियां देखने को मिली, क्योंकि भाजपा के खिलाफ जहर उगलने वाले राउत इस बार थोड़ा कम बोलकर ही ठहर गए.

एनसीपी प्रमुख ने काट ली कन्नी!
शरद पवार ने एक ऐसा बयान दिया जो शिवसेना के लिए किसी करारे तमाचे से कम नहीं है. पवार ने उद्धव ठाकरे को हाई वोल्टेज के झटके से नवाजा है. इसमें कोई दो राय नहीं है, कि भाजपा से नाता तोड़ने के बाद शिवसेना पूरी तरह से कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन के सहारे कूद रही थी. लेकिन शिवसेना की पतंग सीएम की कुर्सी तक पहुंचती ही कि एनसीपी प्रमुख ने शिवसेना से कन्नी ही काट ली. शरद पवार ने शिवसेना के साथ किसी कॉमन मिनिमम प्रोग्राम (CMP) पर सहमति से ही इनकार कर दिया है.

इसके अलावा महाराष्ट्र में सरकार बनाने को लेकर जब उनसे सवाल पूछा गया कि तो उन्होंने चुप्पी साध ली, पवार ने इसके बाद ये तक कह दिया कि कांग्रेस और एनसीपी ही इस पर फैसला नहीं ले सकते, अन्य सहयोगियों से भी बात करेंगे. उन्होंने इस सवाल पर भी कुछ नहीं बोला कि क्या उनकी पार्टी ने सरकार बनाने के लिए शिवसेना को किसी तरह को कोई भरोसा दिया है.

तो क्या पवार के बयान से डर गई शिवसेना?
इन सबके बीच सबसे हैरानी उस वक्त हुई जब शरद पवार के इस बयान और चुप्पी के बाद शिवसेना नेता संजय राउत मुंह उठाकर एनसीपी प्रमुख से मुलाकात करने पहुंच गए. मुलाकात के बाद राउत ने एक बाद फिर इस गठबंधन का ठिकरा तो भाजपा केआपको बता दें, महाराष्ट्र विधानसभा के नतीजे जब सामने आए तो उसमें शिवसेना-भाजपा गठबंधन को बहुमत हासिल हुई थी, लेकिन शिवसेना मुख्यमंत्री पद के लिए जजिद पर अड़ गई और देखते ही देखते भाजपा से नाता तोड़ ली. चुनावी नतीजों में भाजपा को 105 सीट, शिवसेना को 56, एनसपी को 54 और कांग्रेस को 44 सीटों पर जीत मिली थी, लेकिन बहुमत किसी भी पार्टी को नहीं मिली थी, लेकिन सरकार बनाने को लेकर शिवसेना के साथ बड़ा खेल होता दिखाई दे रहा है.



लेकिन महराष्ट्र की जनता प्रदेश में हो रहे राजनीतिक उठापटक से तंग आ चुकी है. हर वोटर खुद को ठगा महसूस कर रहा है. सिर पर फोड़ दिया. लेकिन सच्चाई क्या है और कौन कितना सच्चा है इसके बारे में कुछ भी बोल पाना बेहद मुश्किल होगा. सवाल यहां ये भी है कि क्या शरद पवार का रुख देखकर क्या शिवसेना घबराने लगी थी कि कहीं, उसकी चालाकी उसी पर भारी ना पड़ जाए, जो होता दिखाई दे रहा है. लेकिन अब अगर एनसीपी-कांग्रेस ने शिवसेना से कन्नी काट ली है तो उसके पास चारा क्या बचा है.

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महाराष्ट्र की सियासत में यह है शिवसेना की सीक्रेट शक्ति

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जब भी एक दल मजबूत स्थिति में होती तो दूसरे पर अपनी शर्त थोपती है. 2019 चुनाव से पहले जब देश में माहौल उस तरह से प्रधानमंत्री मोदी के पक्ष में नहीं दिख रहा था तब महाराष्ट्र में बीजेपी ने झुककर शिवसेना से समझौता किया. पिछली बार की तुलना में कम सीटों पर समझौता किया.




'मैं जो कहूंगा कमलाबाई वही करेगी.' ये बात अस्सी के दशक में अक्सर बाला साहेब ठाकरे बोला करते थे. कमला बाई से उनका तात्पर्य कमल वाली पार्टी यानी भारतीय जनता पार्टी(बीजेपी) से थी. शायद शिवसेना के भीतर बीजेपी के लिए वही भाव स्थाई घर कर गया है. इसकी वजह भी है. जनसंघ के बाद जब संघ की नई राजनीतिक इकाई बीजेपी बनी तो उसे सियासत में अपने अस्तित्व के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी.

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एक जमाने में बीजेपी सियासी रूप से अछूत पार्टी मानी जाती थी. कोई भी दल केंद्रीय राजनीति में बीजेपी के साथ गठबंधन को तैयार नहीं थी. उस दौर में शिवसेना ने बीजेपी का साथ दिया. ये वो दौर था जब मुंबई में बाला साहेब की तूती बोलती थी. उनका आदेश किसी भी प्रशासनिक आदेश के ऊपर माना जाता था. एक समानांतर सत्ता की तरह चलता था शिवसेना का शासन.

वक्त के साथ शिवसेना के कंधे पर सवार होकर महाराष्ट्र की रानजीति में प्रवेश करने वाली बीजेपी ने अपनी ताकत बढ़ा ली. उसकी हैसियत छोटे भाई से बड़े भाई में तब्दील हो गई. लोकतंत्र में संख्याबल सबसे बड़ा सच है और उस सच्चाई में शिवसेना कहीं ना कहीं पिछड़ गई. अब सीट तो शिवसेना की कम हुई लेकिन उसकी हनक कम नहीं हुई.

जिद शिवसेना की पहचान

हर हाल में अपनी बात मनवाने की जिद बाला साहेब के जमाने से शिवसेना की पहचान है. दरअसल पिछले करीब पांच दशकों से शिवसेना मुंबई में सत्ता का पर्याय बनी हुई है. विधानसभा में अगर कभी गच्चा खाया भी तो बीएमसी पर एकछत्र शिवसेना का राज्य कायम रहा. मराठी अस्मिता के बहाने वहां के मराठी लोगों की रगों में शिवसेना और खासतौर पर बालासाहेब इस तरह रच बस गए हैं.

पहली नजर में भले ही शिवसेना का एनसीपी और कांग्रेस के साथ जाने को लोग उसकी मूल भावना से अलग मानते हैं लेकिन सियासत में बहुत सी बातें किंतु-परंतु से परे होती हैं.

जब शिवसेना थी वसंत सेना

महाराष्ट्र की राजनीति को समझने वाले इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि बाला साहेब और शिवसेना को शुरुआत में खड़ा करने के पीछे भी कांग्रेस का ही हाथ रहा है. उस वक्त की सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी ने करीब दो दशकों तक बाल ठाकरे का सहयोग किया. उस दौरान लाल झंडे वालों का मुंबई में बड़ा बोलबाला था. हर बात पर आंदोलन से तंग महाराष्ट्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार को उसको जवाब देने वाला शख्स चाहिए था. बाला साहेब में कांग्रेस को वो जवाब दिख गया.

कांग्रेस ने कम्युनिस्ट आंदोलन को तोड़ने में ठाकरे से मदद ली. बदले में शिवसेना को खड़ा करने में उनका सहयोग किया. उन दिनों महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे वसंतराव नायक. शिवसेना को लेकर उनके सॉफ्ट कार्नर की वजह से लोग मजाक में शिवसेना को तब ‘वसंत सेना’ भी कहते थे.

इंदिरा का समर्थन

वसंतराव नायक के बाद भी कई मौकों पर कांग्रेस के साथ शिवसेना खड़ी नजर आई थी. इसमें सबसे अहम वक्त वो था जब बाला साहब ने आपातकाल को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का समर्थन किया था. इतना ही नहीं जब इंदिरा गांधी को 1978 में गिरफ्तार किया गया तो शिवसेना ने उसके विरोध में बंद का आह्वान भी किया था.

एनसीपी के साथ रिश्ता पुराना

महाराष्ट्र में आगामी सरकार की रुपरेखा तय करने वाले शरद पवार के साथ शिवसेना का रिश्ता बहुत ही पुराना है. पवार उन लोगों में से थे जिन्हें बाला साहेब अपने यहां सपरिवार रात्रिभोज पर बुलाया करते थे. अपनी आत्मकथा 'ऑन माई टर्म्स' में शरद पवार ने लिखा है- बाला साहेब ने अगर एक बार आपको अपना दोस्त बोल दिया तो बोल दिया. वो अपनी दोस्ती हमेशा निभाते थे. ये वाकया सितंबर, 2006 का है जब मेरी बेटी सुप्रिया राज्यसभा चुनाव लड़ने वाली थी.

बाला साहेब ने मुझे फोन किया. वो बोले, 'शरद बाबू मैं सुन रहा हूं, हमारी सुप्रिया चुनाव लड़ने जा रही है और तुमने मुझे इसके बारे में बताया ही नहीं. मुझे यह ख़बर दूसरों से क्यों मिल रही है?'

"मैंने कहा, 'शिव सेना-बीजेपी गठबंधन ने पहले ही उसके ख़िलाफ़ उम्मीदवार उतार दी है. मैंने सोचा मैं आपको क्यों परेशान करूं.'

बाल ठाकरे बोले- मैंने सुप्रिया को तब से जनता हूं जब वो मेरे घुटनों के बराबर हुआ करती थी. मेरा कोई भी उम्मीदवार सुप्रिया के ख़िलाफ़ चुनाव नहीं लड़ेगा. तुम्हारी बेटी मेरी बेटी है.

मैंने उनसे पूछा- आप बीजेपी का क्या करेंगे?

उन्होंने जवाब दिया- कमलाबाई की चिंता मत करो. वो वही करेगी जो मैं कहूंगा.

क्यों साथ आ रही शिवसेना

संबंधों की इन्हीं मजबूती के दम पर आज शिवेसना एनसीपी और कांग्रेस के साथ सरकार बनाने का बड़ा कदम उठा रही है. कहते हैं कि सियासत में दुश्मन के साथ-साथ अपने दोस्त को भी ताकत दिखानी पड़ती है. शिवसेना इस बार बीजेपी को अपनी वही अंदरुनी ताकत दिखा रही है. वैसे बीजेपी के साथ शिवसेना की ये दूरी कोई पहली बार नहीं हुई है.

खासतौर पर 2014 में केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद स्थिति तनावपूर्ण कई बार नजर आई. आए दिन सामना में बीजेपी की आलोचना वाली हेडलाइन नजर आती थी. घरेलू से लेकर अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर शिवसेना का रुख सरकार के साथ रहते हुए भी अलग नजर आता था. तुम्हीं से मोहब्बत, तुम्हीं से लड़ाई की तर्ज पर शिवसेना-बीजेपी साथ बनी हुई थी.

शुरुआती खींचतान से सबको यही लग रहा था कि एक दूसरे के साथ सौदेबाजी कर दोनों फिर साथ ही सरकार बनाएंगे लेकिन अब बात बहुत आगे बढ़ चुकी है. शिवसेना इसके लिए सिर्फ बीजेपी को जिम्मेदार बता रही है. सत्ता के 50-50 बंटवारे की बात को लेकर बाला साहेब की सौगंध खा रही है. अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए एनसीपी और कांग्रेस का साथ कबूल किया है. शायद ये एनडीए के दो सबसे पुराने दोस्तों में सियासी दुश्मनी की शुरुआत है.

क्या है सियासत का तकाजा?

सियासत का ये तकाजा है. जब भी की दल मजबूत स्थिति में होती तो दूसरे पर अपनी शर्त थोपती है. 2019 चुनाव से पहले जब देश में माहौल उस तरह से प्रधानमंत्री मोदी के पक्ष में नहीं दिख रहा था तब महाराष्ट्र में बीजेपी ने झुककर शिवसेना से समझौता किया. पिछली बार की तुलना में कम सीटों पर समझौता किया. ये बात अलग है कि जब परिणाम उनके पक्ष में आया. पहले से ज्यादा ताकत के साथ प्रधानमंत्री मोदी सत्ता में वापस आए. इसके बाद पहली दरार शपथग्रहण के दिन ही दिखी जब शिवसेना को कैबिनेट में सिर्फ एक ही जगह मिली. उस वक्त महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव पर नजरें गड़ाए शिवसेना ने चुप्पी साधे रखी लेकिन विधानसभा चुनाव के बाद अपना असली पत्ता खोल दिया. सत्ता का खेल ऐसा है कि एनडीए को दो सबसे पुराने दोस्त आमने-सामने हैं. ये बात अलग है कि महाराष्ट्र के सिंहासन के सामने खड़े नए गठबंधन पर कई लोग सवालिया निगाह लगाए बैठे हैं.

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श्रीलंका राष्ट्र्पति चुनाव में भी खिला कमल, मुस्लिमों ने पूछा- हाय! हम कहाँ जाएँ?

श्रीलंका राष्ट्र्पति चुनाव में भी खिला कमल


श्रीलंका मुस्लिम काउंसिल ने चुनाव परिणाम जारी होने से पहले ही कहा था कि इस चुनाव में मुस्लिम काफ़ी डरे हुए हैं और गोटाभाया के जीतने से उनके भीतर का डर और बढ़ेगा। गोटाभाया एक बौद्ध राष्ट्र्वादी हैं, जो सुरक्षा के मामले में किसी भी प्रकार का समझौता करने या दया दिखाने के ख़िलाफ़ रहे हैं।



श्रीलंका में अप्रैल 2019 में हुए ईस्टर बम ब्लास्ट के घाव अभी तक ताज़ा हैं। इस घटना में इस्लामिक आतंकियों का हाथ निकलने के बाद अब तक कई ऐसे मामले आ चुके हैं, जहाँ श्रीलंका में मुस्लिमों का बहिष्कार किया गया। अब राष्ट्रपति चुनाव में भी एक बौद्ध राष्ट्रवादी की जीत हुई है। रविवार (नवंबर 17, 2019) को जारी किए गए मतगणना परिणाम के अनुसार, लेफ्टिनेंट कर्नल नंदसेना गोटाभया राजपक्षे राष्ट्रपति चुनाव जीत चुके हैं। वो पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे के भाई हैं। महिंदा, बासिल, चामल और गोटाभाया- ये चारों राजपक्षे भाई दशकों से श्रीलंका की राजनीति में प्रभावी रहे हैं और शीर्ष पदों पर काबिज रहे हैं।




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श्रीलंका मुस्लिम काउंसिल के अध्यक्ष हिल्मी अहमद ने चुनाव परिणाम जारी होने से पहले ही कहा था कि इस चुनाव में मुस्लिम काफ़ी डरे हुए हैं और गोटाभाया के जीतने से उनके भीतर का डर और बढ़ेगा। गोटाभाया एक बौद्ध राष्ट्र्वादी हैं, जो सुरक्षा के मामले में किसी भी प्रकार का समझौता करने या दया दिखाने के ख़िलाफ़ रहे हैं। वो इससे पहले श्रीलंका के डिफेंस चीफ रह चुके हैं। श्रीलंका मुस्लिम काउंसिल ने कहा था कि गोटाभाया जीतने के बाद मुस्लिम-विरोधी एजेंडा को लागू करने में पूरी ताक़त लगा देंगे और मुस्लिमों का दमन करेंगे। मुस्लिम संगठनों का पूछना है कि राजपक्षे की जीत के बाद उनका क्या होगा? वो कहाँ जाएँगे?


श्रीलंका में मुस्लिम संगठनों के आरोपों के बीच गोटाभाया की जीत अहम है। इससे पता चलता है कि द्वीपीय देश अभी ईस्टर बम ब्लास्ट को भूला नहीं है और राइट विंग की तरफ़ उनका झुकाव पहले से काफ़ी ज्यादा बढ़ा है। उस बम ब्लास्ट में 270 लोग मारे गए थे। इस चुनाव में गोटाभाया राजपक्षे का चुनाव चिह्न कमल छाप था। श्रीलंका में 70% लोग सिंहला बौद्ध हैं और राजपक्षे उनकी ही भावनाओं पर सवार होकर राष्ट्रपति पद तक पहुँचे हैं, क्योंकि उन्होंने राष्ट्रवाद को चुनावी मुद्दा बनाया था।

चुनाव परिणामों के अनुसार, राजपक्षे को 6,310,035 मत मिले। वहीं दूसरे नंबर पर रहे उनके प्रतिद्वंद्वी सजीत प्रेमदासा को 5,184,552 मत प्राप्त हुए। अगर प्रतिशत की बात करें तो राजपक्षे को 52% मत मिले, वहीं प्रेमदासा को 42% मत मिले। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरा चुनाव परिणाम स्पष्ट होने से पहले ही राजपक्षे को बधाई दे दी। उन्होंने साफ़-सुथरे चुनाव के लिए श्रीलंका की जनता को भी बधाई दी। मोदी ने कहा कि वो शांति और समृद्धि के लिए राजपक्षे के साथ मिल कर काम करेंगे।



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शिवसेना की उम्मीदों पर फिरा पानी, कांग्रेस-NCP ने दिया जोर का झटका

 कांग्रेस-NCP ने दिया जोर का झटका


महाराष्ट्र में चुनाव नतीजों को आए करीब 23 दिन हो गए हैं, लेकिन अभी तक राज्य में मुख्यमंत्री नहीं बन सका है। जानकारी के अनुसार रविवार को होने वाली सोनिया और पवार की बैठक भी निरस्त हो चुकी है।



दरअसल, शिवसेना चाहती थी कि बाला साहब की पुण्यतिथि यानि 17 नवंबर को हमारी सरकार बने ताकि हम उसका जश्न धूमधाम से मना सके और ठाकरे साहब को सच्ची श्रद्वांजलि आर्पित कर सके। लेकिन सोनिया और पवार की बैठक रद्द होने के चलते अभी शिवसेना की इस उम्मीद पर पानी फिरता नजर आ रहा है।

लेकिन सूत्रों का कहना है कि सीएम बनाने पर अड़ी शिवसेना का एनसीपी और कांग्रेस के साथ सरकार बनाना लगभग तय माना जा रहा है। इसका एलान जल्द हो सकता है।

मंत्री अनिल विज ने महाराष्ट्र की राजनीति पर दिया बड़ा बयान

वहीं हरियाणा सरकार में एक बार फिर से कैबिनेट मंत्री बनने के बाद अनिल विज ने महाराष्ट्र की राजनीति पर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि महाराष्ट्र में सरकार बनाने के मोह में राजनीतिक पार्टियां निर्वस्त्र हो रहे हैं। कांग्रेस और शिवसेना ने हमेशा से ही एक दूसरे के खिलाफ राजनीति की है। राम मंदिर को लेकर शिवसेना और कांग्रेस की हमेशा अलग रणनीति रही है। जिन दलों की विचारधारा नही मिलती उनका गठबंधन 4 दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात की ही तरह है।

जानकारी के अनुसार तीनों पार्टी के शीर्ष नेताओं का कहना है कि शिवसेना सावरकर, गोडसे, बांग्लादेशी घुसपैठियों और मुस्लिम आरक्षण पर रुख नरम करेगी और इन मुद्दों पर आक्रामक होने से बचेगी। किसानों की कर्जमाफी, मुंबई व अन्य शहरों में आधारभूत विकास, 10 रुपये में थाली, एक रुपये में मरीजों की जांच जैसे जनहित के मुद्दों पर तीनों दल मिलकर काम करेंगे। साथ ही विवादास्पद मुद्दों को छोड़कर एक-दूसरे के प्रमुख चुनावी वादों को पूरा करने में मदद करेंगे।

शरद पवार ने बुलाई कोर कमेटी की बैठक

एनसीपी नेता नवाब मलिक ने कहा- शरद पवार ने रविवार शाम चार बजे पुणे में पार्टी की कोर कमेटी की बैठक बुलाई है। राज्यपाल के साथ कांग्रेस-एनसीपी-शिवसेना प्रतिनिधिमंडल की मुलाकात टली। ये बैठक आज शाम साढ़े चार बजे होनी थी।

किसानों को मुआवजे का एलान

इस बीच राज्यपाल ने बेमौसम बारिश से नुकसान झेलने वाले किसानों के लिए मुआवजे का एलान किया है। राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने खरीफ फसल के लिए प्रति एकड़ 8 हजार रुपये और बागवानी व बहुवर्षीय फसलों के लिए 18 हजार रुपये प्रति एकड़ मुआवजे का एलान किया है।

शिवसेना नेता संजय राउत ने एक बार फिर दोहराया, महाराष्ट्र में शिवसेना का ही सीएम होगा।

सोनिया-पवार की बैठक भी टली
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और एनसीपी प्रमुख शरद पवार के बीच रविवार को होने वाली बैठक सोमवार तक के लिए टल गई है।

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रजत शर्मा ने DDCA से दिया इस्तीफा, लगाए ये बड़े आरोप

रजत शर्मा ने DDCA से दिया इस्तीफा, लगाए ये बड़े आरोप


रजत शर्मा ने दिल्ली एंड डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन (डीडीसीए) के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है निष्ठा, ईमानदारी और पारदर्शिता वाले मेरे सिद्धांतों के साथ डीडीसीए में चलना संभव नहीं है, जिनसे मैं किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करूंगा।



खबरों के मुताबिक मशहूर पत्रकार रजत शर्मा के खिलाफ डीडीसीए के बाकी निदेशकों ने प्रस्ताव पास कर उनकी शक्तियां छीन ली थीं जिसकी वजह से उनके पास ज्यादा काम रह नहीं गया था।

बता दें कि जुलाई 2018 में वरिष्ठ पत्रकार रजत शर्मा पूर्व क्रिकेटर मदन लाल को 517 मतों से हराकर डीडीसीए के अध्यक्ष बने थे। रजत शर्मा के इस्तीफे की जानकारी डीडीसीए ने ट्विटर पर दी है।

रजत शर्मा के इस्तीफे के बाद डीडीसीए में इस्तीफा देने वालों की लाइन लग गई है। रजत शर्मा के इस्तीफे के कुछ देर बाद ही सुनील वाल्‍सन, सीईओ रविकांत चोपड़ा, सीएफओ प्रेम वैश और यशपाल शर्मा ने भी अपना पद छोड़ ‌दिया।

वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि मुझे अपने प्रयास में कई तरह की बाधाओं, विरोध और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। बस मुझे निष्पक्ष और पारदर्शी तरीकों से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने से रोकना था। शर्मा ने कहा कि इसलिए मैंने हटने का फैसला किया है और डीडीसीए अध्यक्ष पद से तत्काल प्रभाव से अपना त्यागपत्र शीर्ष परिषद को सौंप दिया है।

रजत शर्मा ने डीडीसीए अध्यक्ष रहते दिल्ली के ऐतिहासिक स्टेडियम फिरोजशाह कोटला का नाम बदलकर अरुण जेटली स्टेडियम रखने का प्रस्ताव दिया था, जिसे मंजूरी मिली। बता दें कि दिवंगत पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली और पत्रकार अरुण जेटली अच्छे मित्र थे। इसके अलावा अरुण जेटली डीडीसीए के लंबे समय तक अक्ष्यक्ष रहे थे।

रजत शर्मा ने अपने पत्र में यह भी लिखा कि जब उन्होंने डीडीसीए के अध्यक्ष पद की कमान संभाली थी तो संघ का खजाना खाली था, लेकिन अब एसोसिएशन के पास लगभग 25 करोड़ रुपये का कोष है। रजत शर्मा ने लिखा है कि मैं आपसे आग्रह करता हूं कि यह धन(करीब 25 करोड़ रुपये) केवल क्रिकेट को बढ़ावा देने और क्रिकेटरों की मदद के लिए खर्च किया जाएं।

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अयोध्या मामले में इस मुस्लिम अभिनेत्री ने कहा, अगर कोई...


सुप्रीम कोर्ट द्वारा विवादित राम जन्मभूमि पर दिए गए ऐतिहासिक फैसले के बाद लगभग सभी लोगों ने इस फैसले का सम्मान किया है. बॉलीवुड सितारों ने भी इस फैसले का सम्मान किया है अबतक हिंदी सिनेमा जगत के कई सितारों ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से इस फैसले की तारीफ की है और लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है.



किसी न किसी वजह से हमेशा विवादों में रहने वाली अभिनेत्री गौहर खान ने भी इस मामले में बेहद ही शानदार बयान दिया है. कुछ समय पहले ही गौहर खान ने सोशल मीडिया अकाउंट के माध्यम से इस फैसले पर बात करते हुए लिखा है कि 'जो लोग फैसले पर भड़काने की कोशिश करें तो उसे क्या जवाब देना है. जिसमें उन्होंने लिखा कि, 'इस्लाम की सुंदरता यह है कि आप मुस्लिम होने के नाते कहीं पर भी प्रार्थना कर सकते हैं.

आप यात्रा कर रहे हो तो सड़क के साइड में बैठकर भी प्रार्थना कर सकते हैं, आपकी सलाह स्वीकार हो जाएगी, यह चीज किसी भी जमीन पर सीमित नहीं है, जहां आप नमाज पढ़ते हो वह आपकी स्थिति और परिस्थिति पर आधारित होती है ।'

गौहर खान ने इस पोस्ट के साथ एक फोटो भी शेयर करते हुए लिखा कि, 'जो कोई भी आप को भड़काने की कोशिश करें उसके लिए यह पोस्ट है, बड़े व्यक्ति बने और शांति बनाए रखें ।' सोशल मीडिया पर गौहर खान का यह पोस्ट काफी तेजी से वायरल हो रहा है जिसकी लगभग सभी लोग प्रशंसा कर रहे हैं.

गौहर खान भारत की एक मशहूर अभिनेत्री है वह बेहद ही खूबसूरत दिखाई देती है. खास बात यह है कि गौहर खान कई बार अपने विवादित बयानों की वजह से सुर्खियों में आ चुकी है. लेकिन अयोध्या राम मंदिर पर गौहर खान के बयान की वजह से उनकी चारों तरफ प्रशंसा हो रही है.